
विश्ववस्तु-विधृतिक्षमं लसत्,
जालमन्त-परिवर्जितं गिराम् ।
अस्तमेत्यऽखिलमेकहेलया,
यत्र तज्जयति चिन्मयं मह: ॥5॥
सकल पदार्थ प्रकाशक शाश्वत, स्वयं प्रकाश-स्वरूप अहो !
वचन-अगोचर अविनाशी, चैतन्य तेज जयवन्त रहो॥
अन्वयार्थ : जो चैतन्यरूपी तेज, समस्त पदार्थों का प्रकाश करने वाला है, स्वयं प्रकाशरूप है, अन्त से रहित है तथा यदि समस्त वाणी युगपत् मिल भी जाए तो उसका वर्णन करने में असमर्थ है अर्थात् जो वाणी के अगोचर है - ऐसा वह चैतन्यरूपी तेज, इस लोक में सदा जयवन्त है ।