
नो विकल्प-रहितं चिदात्मकं,
वस्तु जातु मनसोऽपि गोचरम् ।
कर्मजाऽऽश्रितविकल्परूपिण:,
का कथा तु वपुषो जडात्मन: ॥6॥
निर्विकल्प चैतन्य तेज, मन से भी ज्ञात न हो सकता ।
कैसे कर्मज जड़-विकल्प अरु, इन्द्रिय-गोचर हो सकता॥
अन्वयार्थ : समस्त प्रकार के विकल्पों से रहित चैतन्यरूपी तेज, जब किसी भी प्रकार मन के द्वारा भी गोचर नहीं हो सकता; तब वह तेज, कर्मों से पैदा हुए नाना विकल्पात्मक तथा जड़स्वरूप शरीर के द्वारा गोचर कैसे हो सकता है? अर्थात् कदापि नहीं हो सकता ।