
चेतसो न वचसोऽपि गोचर:,
तर्हि नास्ति भविता खपुष्पवत् ।
शंकनीयमिदमऽत्र नो यत:,
स्वानुभूतिविषयस्ततोऽस्ति तत् ॥7॥
मन-वचनों से गम्य नहीं तो, चेतन है नभ-पुष्प समान ।
ऐसी शंका करो नहीं वह, स्वानुभूति-गोचर सत् जान॥
अन्वयार्थ : यदि कोई मनुष्य, इस बात की शंका करे कि चैतन्यरूपी तेज न मन गोचर है और न वचन गोचर है, इसलिए आकाश के फूल के समान उसका नास्तित्व ही जाएगा तो आचार्य समाधान देते हैं कि ऐसी शंका कदापि नहीं करना चाहिए क्योंकि वह चैतन्यरूपी तेज स्वानुभव से जाना जाता है, इसलिए नास्तित्व न होकर उसका अस्तित्व ही जानो ।