+ मन का डर - परमात्मा में स्थित होने पर उसका मरण -
नूनमत्र परमात्मनि स्थितं,
स्वान्तमन्तमुपयाति तद्बहि: ।
तं विहाय सततं भ्रमत्यद:,
को बिभेति मरणान्न भूतले ॥8॥
परमात्मा में थिर होने से, मन विनष्ट है हो जाता ।
अत: भ्रमे नित बाहर ही मन, कौन न मरने से डरता ?
अन्वयार्थ : जिस समय मन, परमात्मा में स्थित होता है, उस समय उस मन का नाश (मरण) हो जाता है; इसलिए यह मन, परमात्मा को छोड़ कर, यहाँ-वहाँ बाहर भ्रमण करता रहता है क्योंकि पृथ्वीतल में मरण से कौन नहीं डरता है? अर्थात् सब ही डरते हैं ।