
तत्त्वमात्म-गतमेव निश्चितं, योऽन्यदेशनिहितं समीक्षते ।
वस्तु मुष्टिविधृतं प्रयत्नत:, कानने मृगयते स मूढधी: ॥9॥
तत्त्व आत्मा में ही बसता, बसे न किञ्चित् बाहर में ।
जो बाहर देखे वह खोजे, वस्तु हस्तगत को वन में॥
अन्वयार्थ : निश्चयनय से यह चैतन्यस्वरूपी तत्त्व, आत्मा ही है, वह आत्मा से भिन्न किसी भी स्थान में नहीं है; किन्तु जो मनुष्य, 'आत्मा से भिन्न किसी दूसरे स्थान में चैतन्यरूपी तत्त्व रहता है' - ऐसा जानते हैं; वे मूढ़बुद्धि मनुष्य, मुट्ठी में रखी हुई वस्तु को वन में जाकर ढूँढ़ने के समान कार्य करते हैं ।