
तत्पर: परम-योग-सम्पदां, पात्रमत्र न पुनर्बहिर्गत: ।
नाऽपरेण चलित: यथेप्सित:, स्थानलाभविभवो विभाव्यते ॥10॥
आत्म-निष्ठ ही परम योग का, पात्र किन्तु पर-निष्ठ नहीं ।
अन्य मार्ग से चलने वाला, मंजिल पाता कभी नहीं॥
अन्वयार्थ : यदि कोई मनुष्य, यथार्थ मार्ग को छोड़ कर, दूसरे मार्ग से चले तो उसे अभीष्ट स्थान का लाभ कदापि नहीं हो सकता, किन्तु यदि वह यथार्थ मार्ग पर चले तो अपने अभीष्ट स्थान पर पहुँच सकता है; उसी प्रकार जो पुरुष, आत्मा में आसक्त हैं, वे ही उत्कृष्ट ध्यान के पात्र हैं तथा जो मनुष्य, आत्मा में आसक्त नहीं हैं, बाह्य पदार्थों में ही आसक्त हैं, वे उत्कृष्ट ध्यान के पात्र कदापि नहीं हैं और न ही हो सकते हैं । इसलिए उत्कृष्ट ध्यान के प्रेमी उत्तम पुरुषों को आत्मा में अवश्य आसक्त रहना चाहिए ।