+ चैतन्यतत्त्व में लक्ष्य नहीं देने वाले तपस्वी, जड़-अज्ञानी-नट के समान -
साधु लक्ष्यमनवाप्य चिन्मये, यत्र सुष्ठु गहने तपस्विन: ।
अप्रतीति-भुवमाश्रिता जडा, भान्ति नाट्य-गतपात्रसन्निभा: ॥11॥
अतिशय गहन निजात्म तत्त्व का, जो न तपस्वी धरते ध्यान ।
अज्ञानी जड़ रहें सदा वे, शोभित नाटक-पात्र समान॥
अन्वयार्थ : जो तपस्वी, अत्यन्त गहन ऐसे चैतन्यरूपी तत्त्व का भलीभाँति लक्ष्य न देकर अज्ञानमयी भूमि के आश्रित हैं अर्थात् अज्ञानी बन रहे हैं, वे तपस्वी जड़ हैं और नाटक के पात्र समान शोभित होते हैं ।