+ अन्धे व्यक्ति द्वारा हाथी को स्पर्श करके जानना व्यर्थ -
भूरिधर्म-युतमप्यबुद्धिमान्, अन्धहस्ति-विधिनाऽवबुध्य यत् ।
भ्राम्यति प्रचुरजन्मसंकटे, पातु व: तदतिशायि चिन्मह: ॥12॥
धर्म-अनन्तमयी चेतन को, जाने अन्ध-हस्ति विधि से ।
अत: चतुर्गति भ्रमण करे तो सबकी रक्षा तेज करे॥
अन्वयार्थ : अज्ञानी पुरुष, अन्ध-हस्ति-न्याय के समान अनेक धर्मों से सहित चैतन्य तत्त्व को जान कर भी अनेक जन्म-संकटों में भ्रमण करता है - ऐसा वह अत्यन्त अतिशय का भण्डार चैतन्यरूपी तेज हमारी रक्षा करें ।