+ अहो आश्चर्य! आत्मा कर्मबन्धन से सहित होने पर भी उससे रहित -
कर्मबन्ध-कलितोऽप्यबन्धनो, रागद्वेष-मलिनोऽपि निर्मल: ।
देहवानपि च देहवर्जित:, चित्रमेतदखिलं चिदात्मन: ॥13॥
बँधा कर्म से किन्तु अबन्धक, राग-द्वेषयुत पर निर्मल ।
देही है पर देह रहित यह, आत्म-स्वरूप अहो! आश्चर्य॥
अन्वयार्थ : आत्मा कर्म-बन्धन से सहित होकर भी कर्म-बन्धन से रहित है; राग-द्वेष से मलिन होने पर भी निर्मल है और देहसहित होने पर भी देहरहित है; इसलिए आत्मा का स्वरूप आश्चर्यकारी है ।