+ अनेकान्त - सर्व विरोध का नाशक -
निर्विनाशमपि नाशमाश्रितं, शून्यमप्यतिशयेन सम्भृतम् ।
एकमेव गतमप्यनेकतां, तत्त्वमीदृगपि नो विरुध्यते ॥14॥
अविनाशी पर नाशवान है, शून्य किन्तु सम्पूर्ण अहो !
एकरूप फिर भी अनेक है, किञ्चित् नहीं विरोध कहो॥
अन्वयार्थ : जो अनेकान्तात्मक तत्त्व, नाशरहित होने पर भी नाशसहित है, शून्य होने पर भी सम्पूर्ण है (भरा हुआ है) तथा एक होने पर भी अनेक है - ऐसा होने पर भी उसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है ।