+ आत्मस्वरूप की प्राप्ति का उपाय -
विस्मृताऽर्थपरिमार्गणं यथा, यस्तथा सहजचेतनाऽऽश्रित: ।
स क्रमेण परमेकतां गत:, स्वस्वरूपपदमाश्रयेद् ध्रुवम् ॥15॥
मूर्च्छित व्यक्ति होश में आकर, ज्यों भूली वस्तु खोजे ।
निजस्वभाव आश्रय ले भविजन, क्रम से निश्चित मुक्ति लहें॥
अन्वयार्थ : मूर्च्छित मनुष्य, जिस प्रकार सावधान होकर अपनी भूली हुई चीज को ढूँढता है; पश्चात् शान्त होकर अपने स्वरूप में स्थित होता है; उसी प्रकार जो मनुष्य, अनादिकाल से भूले हुए अपने स्वाभाविक चैतन्य का आश्रय कर, क्रम से साम्यभाव को धारण करता है, वह मनुष्य, निश्चय से आत्मस्वरूप का आश्रय करता हुआ, आत्मस्वरूप की प्राप्ति करता है ।