+ समस्त उपाधि का नाश होने पर आत्मस्वरूप की प्राप्ति -
यद्यदेव मनसि स्थितं भवेत्, तत्तदेव सहसा परित्यजेत् ।
इत्युपाधि-परिहारपूर्णता, सा यदा भवति तत्पदं तदा ॥16॥
मन में जो विकल्प होते हैं, उनको तुम तत्काल तजो ।
जब सम्पूर्ण उपाधि विलय हों, तभी मुक्ति-पद प्राप्ति अहो !
अन्वयार्थ : जो-जो बात, मन में होवे (अर्थात् जिस-जिस बात की मन में इच्छा होवे), उस-उस बात को तत्काल छोड़ देवें । इस प्रकार जब समस्त उपाधि का नाश हो जाता है, तब आत्मस्वरूप की प्राप्ति हो जाती है ।