
संहृतेषु खमनाऽनिलेषु यद्, भाति तत्त्वममलात्मन: परम् ।
तद्गतं परमनिस्तरङ्गतां, अग्निरुग्र इह जन्मकानने ॥17॥
मन-इन्द्रिय-श्वासोच्छ्वास, रुकने से प्रगटेआत्मस्वरूप ।
निश्चल आत्मतत्त्व शोभित यह, भववन को है अग्निस्वरूप॥
अन्वयार्थ : पाँचों इन्द्रिय, मन और श्वासोच्छ्वास के संकुचित होने पर, आत्मा का निर्मल तथा उत्कृष्ट स्वरूप उदित होकर शोभित होता है - ऐसा वह अत्यन्त निश्चल आत्मतत्त्व, संसाररूपी वन के लिए भयंकर अग्नि के समान है ।