
मुक्त इत्यपि न कार्यमंजसा, कर्मजाल-कलितोऽहमित्यपि ।
निर्विकल्प-पदवीमुपाश्रयन्, संयमी हि लभते परं पदम् ॥18॥
कर्मरहित या कर्मबद्ध हूँ, कोई विकल्प न साधु करें ।
निर्विकल्प पद के आश्रय से, अहो! संयमी मुक्ति लहें॥
अन्वयार्थ : 'मैं समस्त कर्मों से रहित मुक्त हूँ'ह्न ऐसा भी संयमियों को नहीं मानना चाहिए तथा 'मैं समस्त कर्मों से सहित संसारी हूँ' - ऐसा भी नहीं मानना चाहिए क्योंकि निर्विकल्प पदवी का आश्रय करने वाला संयमी ही मोक्षपद को प्राप्त होता है ।