+ द्वैत और अद्वैत - दोनों प्रकार की बुद्धियाँ उपाधिजन्य -
कर्म चाऽहमिति च द्वये सति, द्वैतमेतदिह जन्मकारणम् ।
एक इत्यपि मति: सती न यत्, साप्युपाधि-रचिता तदङ्गभृत् ॥19॥
'कर्म' और 'मैं' दोनों हैं, यह द्वैत, बन्ध का कारण है ।
'एकरूप मैं' - ऐसी चेतन, की मति भी औपाधिक है॥
अन्वयार्थ : हे जीव! 'कर्म' तथा 'मैं', दो हैं - इस प्रकार का द्वैत भी जीवों को संसार का कारण है क्योंकि इस प्रकार के द्वैत से भी जीवों को नाना प्रकार के भवों में भ्रमण करना पड़ता है तथा 'मैं एक हूँ' - यह बुद्धि भी ठीक नहीं हैं क्योंकि ये दोनों प्रकार की बुद्धियाँ उपाधिजन्य हैं ।