
संविशुद्ध-परमात्मभावना, संविशुद्ध-पदकारणं भवेत् ।
सेतरेतरकृते सुवर्णतो, लोहतश्च विकृतिस्तदाश्रिते ॥20॥
शुद्धभावना से मुक्तिपद, अशुद्धभावना से संसार ।
स्वर्ण-पात्र उत्पन्न स्वर्ण से, लोहे से हो लौह-कुपात्र॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार सुवर्ण से सुवर्ण-पात्र की उत्पत्ति होती है तथा लोह से लौह-पात्र की उत्पत्ति होती है; उसी प्रकार शुद्ध परमात्मा की भावना करने से शुद्ध मोक्षपद की प्राप्ति होती है तथा अशुद्घ भावना से अशुद्ध स्वर्ग-नरकादि पद की प्राप्ति होती है ।