
कर्म भिन्नमनिशं स्वतोऽखिलं, पश्यतो विशदबोधचक्षुषा ।
तत्कृतेऽपि परमात्मवेदिनो, योगिनो न सुखदु:खकल्पना ॥21॥
निर्मल ज्ञान-चक्षु से निज को, कर्म-रहित देखे योगी ।
कर्मजन्य सुख-दु:ख हों फिर भी, सुख-दु:ख अनुभव करें नहीं॥
अन्वयार्थ : 'समस्त कर्म मुझसे भिन्न हैं' - इस प्रकार निरन्तर अपने सम्यग्ज्ञानरूपी दिव्य चक्षु से देखने वाले तथा परमात्मा को भलीभाँति जानने वाले योगी, कर्म से उत्पन्न सुख-दु:ख के होने पर भी सुख-दु:ख की कल्पना नहीं करते ।