+ योगियों को सूर्य के समान निरालम्ब मार्ग अपनाने का उपदेश -
मानसस्य गतिरस्ति चेन्निरा-,लम्ब एव पथि भास्वतो यथा ।
योगिनो दृगवरोधकारक:, सन्निधिर्न तमसां कदाचन ॥22॥
निरालम्ब पथ में योगी के, मन की गति हो सूर्य समान ।
तो योगी को सम्यग्दर्श-प्रभा-नाशक तम निकट न आन॥
अन्वयार्थ : यदि योगियों के मन की गति सूर्य के समान निरावलम्ब मार्ग में ही हो तो उनके सम्यग्ज्ञान की प्रभा को रोकने वाला अन्धकार कभी भी निकट नहीं आए ।