+ रोग, वृद्धावस्था आदि शरीर के विकार, आत्मा के नहीं -
रुग्जरादि-विकृतिर्न मेऽञ्जसा, सा तनोरहमित: सदा पृथक् ।
मीलितेऽपि सति खे विकारिता, जायते न जलदैर्विकारिभि: ॥23॥
विविध बादलों के संग में भी नभ में किञ्चित् नहीं विकार ।
जरा-रोग-तन के विकार मैं, इनसे सदा पृथक् अविकार॥
अन्वयार्थ : नाना प्रकार के विकारों से सहित मेघों के साथ सम्बन्ध होने पर भी जिस प्रकार आकाश में किसी प्रकार का विकार पैदा नहीं होता क्योंकि वे विकार मेघों के होते हैं; उसी प्रकार रोग, वृद्धावस्था आदि नाना प्रकार के विकार, शरीर के विकार हैं, मेरे (आत्मा के) विकार नहीं क्योंकि मैं शरीर से सदा अलग भिन्न तत्त्व हूँ ।