
व्याधिनाऽङ्गमभिभूयते परं, तद्गतोऽपि न पुनश्चिदात्मक: ।
उत्थितेन गृहमेव दह्यते, वह्निना न गगनं तदाश्रितम् ॥24॥
रोगों से हो देह नष्ट, तद्गत चेतन अविनाशी है ।
ज्यों अग्नि से भवन जले, पर तद्गत नभ न विनाशी है॥
अन्वयार्थ : यदि किसी कारण से मकान में आग लग जाए तो उस आग से मकान ही जलता है, किन्तु उसके भीतर रहा हुआ आकाश नहीं जलता; उसी प्रकार शरीर में किसी कारण से व्याधि उत्पन्न हो जाए तो उस व्याधि से शरीर ही नष्ट होता है, उसके भीतर रहे हुए आत्मा का नाश नहीं होता ।