
शुद्धबोध-मयमस्ति वस्तु यद्, रामणीयकपदं तदेव न: ।
स प्रमाद इह मोहज: क्वचित्, कल्प्यते यदपराऽपि रम्यता ॥27॥
शुद्ध ज्ञानमय वस्तु हमारे, लिए रमण के योग्य अहो !
अन्य वस्तु में रम्य-कल्पना, मोहोत्पन्न प्रमाद कहो॥
अन्वयार्थ : जो शुद्ध बोधस्वरूप अर्थात् निर्मल सम्यग्ज्ञानस्वरूप वस्तु है, वही हमारा रमणीय स्थान है; किन्तु जो मनुष्य, 'निर्मल सम्यग्ज्ञान से अतिरिक्त भी रमणीयता है' - इस बात को कहते हैं; वह वास्तविक रमणीयता नहीं, अपितु मोहनीयकर्म से उत्पन्न हुआ प्रमाद ही है ।