
आत्मबोध-शुचितीर्थमद्भुतं, स्नानमत्र कुरुतोत्तमं बुधा: ।
यन्न यात्यपरतीर्थकोटिभि:, क्षालयत्यपि मलं तदन्तरम् ॥28॥
आत्मज्ञान ही महातीर्थ शुचि, बुध उसमें स्नान करें ।
कोटि तीर्थ से भी न नष्ट हो, वह अन्तर्मल शीघ्र धुले॥
अन्वयार्थ : हे भव्य पण्डितों! यदि तुम अपने पापों का नाश करना चाहते हो तो अत्यन्त पवित्र तथा आश्चर्य के करने वाले इस आत्मज्ञानस्वरूप उत्तम तीर्थ में ही स्नान करो क्योंकि जो अन्तरङ्ग का मल, अन्य करोड़ों तीर्थों में स्नान करने पर भी नष्ट नहीं होता, वह इस आत्मज्ञानस्वरूप तीर्थ में एक समय स्नान करने पर ही नष्ट हो जाता है ।