
चित्समुद्र-तटबद्धसेवया, जायते किमु न रत्नसंचय: ।
दु:खहेतुरमुतस्तु दुर्गति:, किं न विप्लवमुपैति योगिन: ॥29॥
चित्-समुद्र अवगाहन करने, से न मिले क्या रत्न अहो !
क्या योगीजन को दुख-कारण, दुर्गति हो न विनष्ट कहो ?
अन्वयार्थ : जो पुरुष, बड़े उत्साह के साथ चैतन्यरूपी समुद्र के तीर की भलीभाँति सेवा करते हैं; क्या उनको सम्यग्दर्शन आदि रत्नों की प्राप्ति नहीं होती है? इस पाये हुए रत्नसमूह से चैतन्यरूपी समुद्र की सेवा करने वाले मुनियों के द्वारा क्या नाना प्रकार के दु:खों को देने वाली नरकादि खोटी गतियों का नाश नहीं होता ?