+ निश्चयनय से सम्यग्दर्शन आदि तीनों की आत्मा से अभिन्नता -
निश्चयाऽवगमनस्थितित्रयं, रत्नसंचितिरियं परात्मनि ।
योगदृष्टि-विषयीभवन्नसौ, निश्चयेन पुनरेक एव हि ॥30॥
परमात्मा का निश्चय-बोध-स्थिति दर्शन-ज्ञान-चरित्र ।
यो ग-दृष्टि का विषय आत्मा, निश्चय से है एक-स्वरूप॥
जो परमात्मा में निश्चय, ज्ञान और स्थिति है; उन्हीं को सम्यग्दर्शन,
अन्वयार्थ : सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र कहते हैं । केवली भगवान की दृष्टि में ये तीनों निश्चयनय से आत्मस्वरूप ही हैं अर्थात् सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र, आत्मा से भिन्न कोई अन्य पदार्थ नहीं है ।