
प्रेरिता: श्रुतगुणेन शेमुषी-, कार्मुकेण शरवद् दृगादय: ।
बाह्यवेध्य-विषये कृतश्रमा:, चिद्रणे प्रहतकर्मशत्रव: ॥31॥
आगम-डोरी बुद्धि-धनुष से, प्रेरित रत्नत्रय के बाण ।
चिन्मय-रण में बाह्यार्थों का, वेधन कर हो कर्म-विनाश॥
अन्वयार्थ : चैतन्यरूपी संग्राम में, शास्त्ररूपी गुण सहित अर्थात् उससे प्रेरित तथा श्रेष्ठ बुद्धिरूपी धनुष से बाह्य पदार्थों के वेधन करने में तत्पर ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्ररूपी बाण, समस्त कर्मरूपी वैरियों का नाश करने वाले होते हैं ।