
चित्तवाच्य-करणीयवर्जिता, निश्चयेन मुनिवृत्तिरीदृशी ।
अन्यथा भवति कर्मगौरवात्, सा प्रमादपदवीमुपेयुष: ॥32॥
मन-वच-तन वर्जित वृत्ति ही, मुनि की निश्चय से होती ।
कर्मोदय से हो प्रमाद तो, हो विरुद्ध वह मुनि-वृत्ति॥
अन्वयार्थ : निश्चय से मुनियों की जो प्रवृत्ति है; वह मन, वचन व काय की प्रवृत्ति से रहित है; किन्तु वे मुनि, यदि प्रमादी बन जाएँ तो कर्म की गुरुता से उनकी प्रवृत्ति भी विपरीत अर्थात् मन, वचन व काय से सहित हो जाती हैं ।