+ योगियों का ज्ञानसमुद्र, समाधिरूपी चन्द्रमा से वृद्धि को प्राप्त -
सत्समाधि-शशलाञ्छनोदयात्, उल्लसत्यमलबोधवारिधि: ।
योगिनोऽणुसदृशं विभाव्यते, यत्र मग्नमखिलं चराऽचरम् ॥33॥
सत्-समाधि-चन्द्रोदय से जो, ज्ञान-सिन्धु है उछल रहा ।
सकल चराचर जगत् ज्ञान में, अणु समान भासित होता॥
अन्वयार्थ : जिन योगियों के निर्मल ज्ञान में चर-अचर समस्त जगत्, परमाणु के समान ज्ञात होता है - ऐसा वह योगियों का ज्ञानरूपी समुद्र, श्रेष्ठ समाधिरूप चन्द्रमा के उदय से वृद्धि को प्राप्त होता है ।