+ भेदज्ञानरूपी अग्नि से कर्म भी सूखे तृणों के समान भस्मीभूत -
कर्मशुष्कतृणराशिरुन्नतो-,ऽप्युद्गते शुचिसमाधिमारुतात् ।
भेदबोध-दहने हृदि स्थिते, योगिनो झटिति भस्मसाद्भवेत् ॥34॥
परम-समाधि-पवन से प्रेरित, भेद-ज्ञान की अग्नि जले ।
तो योगी-उर में सूखे, पत्तों-सम कर्म समूह जले॥
अन्वयार्थ : पवित्र समाधिरूपी पवन से उदय को प्राप्त भेदज्ञानरूपी अग्नि, जिन योगियों के हृदय में स्थित है, उनके प्रबल कर्म भी सूखे तृणसमूह के समान शीघ्र भस्मीभूत हो जाते हैं ।