
चित्तमत्तकरिणा न चेद्धतो, दुष्ट-बोध-वन-वह्निनाऽथवा ।
योगकल्प-तरुरेष निश्चितं, वांछितं फलति मोक्षसत्फलम् ॥35॥
मनरूपी मतवाले गज या, दुष्ट बोध-दावानल से ।
योग-कल्पतरु नष्ट न हो तो, वाञ्छित शिवफल शीघ्र फले॥
अन्वयार्थ : यदि यह समाधिरूपी कल्पवृक्ष, मनरूपी मतवाले हाथी से नष्ट न किया गया और दुष्ट ज्ञान रूपी वनाग्नि से भस्म न किया गया तो अवश्य ही वाञ्छित मोक्षरूपी श्रेष्ठ फल को देता है ।