+ परमात्मा का ज्ञान होने तक ही शास्त्रज्ञान उपयोगी -
तावदेव मतिवाहिनी सदा, धावति श्रुतगता पुर: पुर: ।
यावदत्र परमात्म-संविदा, भिद्यते न हृदयं मनीषिण: ॥36॥
जब तक आत्मज्ञान से, ज्ञानी की परिणति नहिं भिद जाती ।
तब तक श्रुत के आगे-आगे, मन-सरिता दौड़ी जाती॥
अन्वयार्थ : जब तक यह चित्त, परमात्मा के ज्ञान से भेद (भेदज्ञान) को प्राप्त नहीं होता है, तब तक बुद्धिमान् पुरुष की बुद्धिरूपी नदी, सदा शास्त्रों में आगे-आगे दौड़ती जाती है ।