
य: कषाय-पवनैरचुम्बितो, बोधवह्निरमलोल्लसदृश: ।
किं न मोहतिमिरं विखण्डयन्, भासते जगति चित्प्रदीपक: ॥37॥
जिसे पवन ने छुआ नहीं है, ज्ञानरूप अग्नि जिसमें ।
निर्मल दशा युक्त चित्-दीपक, मोह-विनाशक है जग में॥
अन्वयार्थ : जिस चैतन्यरूपी दीपक का कषायरूपी पवन ने स्पर्श नहीं किया है, जिसमें सम्यग्ज्ञानरूपी अग्नि मौजूद है तथा जिसकी दशा निर्मल और दैदीप्यमान है - ऐसा चैतन्य रूपी दीपक, मोहरूपी अन्धकार को नाश करता हुआ क्या जगत् में प्रकाशमान नहीं है?