+ अपने घर से बाहर विचरण करने वाली स्त्री का दृष्टान्त -
बाह्यशास्त्र-गहने विहारिणी, या मतिर्बहुविकल्पधारिणी ।
चित्स्वरूप-कुलसद्मनिर्गता, सा सती न सदृशी कुयोषिता ॥38॥
बहु विकल्प-धारक जो मति, बाह्य शास्त्र-वन में भ्रमती ।
सती नहीं वह कुलटा नारी, चेतन कुलगृह को तजती॥
अन्वयार्थ : जो बुद्धि, अपने चैतन्यरूपी कुलगृह से बाहर निकली हुई है, अतएव जो बाह्य शास्त्ररूपी वन में विहार करने वाली है और अनेक प्रकार के विकल्पों को धारण करने वाली है, ऐसी वह बुद्धि, उत्तम बुद्धि नहीं; किन्तु कुलटा स्त्री के समान निकृष्ट है ।