+ हेय को छोड़ कर, उपादेय को ग्रहण करके ही मोक्ष की प्राप्ति -
यस्तु हेयमितरच्च भावयत्, नाऽद्यतो हि परमाप्तुमीहते ।
तस्य बुद्धिरुपदेशतो गुरो:, आश्रयेत्स्वपदमेव निश्चलम् ॥39॥
हेय-ग्राह्य का चिन्तन करके, ग्राह्य-प्राप्ति का यत्न करे ।
गुरु-वचनों से उसकी बुद्धि, अविनाशी पद प्राप्त करे॥
अन्वयार्थ : जो भव्य जीव, हेय तथा उपादेय पदार्थों का रात-दिन चिन्तवन करता है और उन दोनों में त्यागने योग्य पदार्थों का त्याग करता है; उस जीव की बुद्धि, उत्तम गुरु के उपदेश से चैतन्यरूपी अविनाशी स्थिर पद को प्राप्त होती है; इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं ।