+ मोह-निद्रा में मग्न को सम्पूर्ण जगत् अपना -
सुप्त एष बहुमोहनिद्रया, लंघित: स्वमबलादि पश्यति ।
जाग्रतोच्च-वचसा गुरोर्गतं, संगतं सकलमेव दृश्यते ॥40॥
गाढ़ मोह-निद्रा में मोही, पर-पदार्थ अपना माने ।
गुरु के उच्च स्वरों से जागृत, ज्ञानी क्षण-भंगुर जाने॥
अन्वयार्थ : गाढ़ मोहरूपी निद्रा ने जिसके ऊपर अपना प्रभाव डाल रखा है, जो मोहरूपी नींद में मग्न है, वह मनुष्य, अपने से भिन्न स्त्री-पुत्र आदि को भी अपना मानता है; लेकिन जो मनुष्य जाग रहा है, उस मनुष्य को तो उत्तम गुरु के उपदेश से समस्त जगत् संयुक्त (संयोग) मात्र क्षणभंगुर ही मालूम पड़ता है ।