+ समाधि की सिद्धि के लिए बाह्य पदार्थों में समता आवश्यक -
जल्पितेन बहुना किमाऽऽश्रयेद्, बुद्धिमानऽमलयोगसिद्धये ।
साम्यमेव सकलैरुपाधिभि:, कर्मजाल-जनितैर्विवर्जितम् ॥41॥
बहुत कहें क्या बुद्धिमान जन, निर्मल योग-सिद्धि के हेतु ।
कर्मोत्पन्न उपाधि-रहित बस, साम्यभाव का लें आश्रय॥
बहुत कहाँ तक कहा जाए जो पुरुष बुद्धिमान हैं (जिन पुरुषों को इस बात का भलीभाँति ज्ञान है कि 'यह पदार्थ त्यागने योग्य है और यह पदार्थ
अन्वयार्थ : ग्रहण करने योग्य है'), उनको चाहिए कि वे निर्मल योग की सिद्धि के लिए नाना प्रकार के कर्मों से पैदा हुई नाना प्रकार की उपाधियों से सर्वथा रहित साम्यभाव का ही आश्रय करें ।