
नाममात्र कथया परात्मन:, भूरिजन्म-कृतपापसंक्षय: ।
बोध-वृत्त-रुचयस्तु तद्गता:, कुर्वते हि जगतां पतिं नरम् ॥42॥
परमातम के नाममात्र से, चिर-संचित अघक्षय होता ।
तद्गत दर्शन-ज्ञान-चरित से, नर भी त्रिभुवनपति होता॥
अन्वयार्थ : परमात्मा के नाममात्र कथन से ही अनेक जन्मों में संचय किया हुआ पापों का समूह पल भर में नष्ट हो जाता है तो उस आत्मा में विद्यमान सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानसम् यक्चारित्ररूपी रत्नत्रय तो मनुष्य को जगत् का पति ही बना देता है अर्थात् परमात्मपद प्राप्त करा देता है; इसमें क्या आश्चर्य है?