+ चैतन्यस्वरूप उत्तम पद में लगा हुआ योगी ही योगीश्वर -
चित्स्वरूप-पदलीनमानसो, य: सदा स किल योगिनायक: ।
जीवराशिरखिलश्चिदात्मको, दर्शनीय इति चाऽऽत्मसन्निभ: ॥43॥
जिनका चित्त स्वरूप-लीन है, वे हैं योगिजनों में श्रेष्ठ ।
सभी जीव चेतन-स्वरूप हैं, अत: किसी में करें न भेद॥
अन्वयार्थ : जिस योगी का चित्त, चैतन्यरूपी मोक्षपद में लगा हुआ है, वही योगी समस्त योगियों में उत्तम योगी है अर्थात् योगियों का ईश्वर है । वह योगीश्वर, समस्त चैतन्यस्वरूप प्राणियों को अपने समान देखता है ।