
अन्तरङ्ग-बहिरङ्गयोगत:, कार्यसिद्धिरखिलेति योगिना ।
आसितव्यमनिशं प्रयत्नत:, स्वं परं सदृशमेव पश्यता ॥44॥
अन्तर्बाह्य योग से ही, योगी के कार्य सिद्ध होते ।
अत: निरन्तर समदृष्टि से, योगी निज-पर को देखे॥
अन्वयार्थ : समस्त कार्यों की सिद्धि अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग योग से होती है; इसलिए जो योगी, स्व तथा पर को समान देखने वाला है, उसे बड़े भारी प्रयत्न से रहना चाहिए ।