
लोक एष बहुभावभावित:, स्वाऽर्जितेन विविधेन कर्मणा ।
पश्यतोऽस्य विकृतीर्जडात्मन:, क्षोभमेति हृदयं न योगिन: ॥45॥
स्वयं किये कर्मो से होने वाले विविध भावमय लोक ।
अत: जगत् जड़ देखें योगी, किन्तु न होता मन में क्षोभ॥
अन्वयार्थ : अपने द्वारा पैदा किये हुए नाना प्रकार के कर्मों से यह लोक अनेक भावरूप है; इसलिए इस जड़स्वरूप संसार को देखते हुए भी योगी का मन, कदापि क्षोभ को प्राप्त नहीं होता ।