
सुप्त एष बहुमोहनिद्रया, दीर्घकालमविरामया जन: ।
शास्त्रमेतदधिगम्य साम्प्रतं, सुप्रबोध इह जायतामिति ॥46॥
गाढ़ मोह-निद्रा में सोता, है अनादि से लोक अरे !
अब यह शास्त्र जानकर भविजन, जागृत दशा प्राप्त होवें॥
अन्वयार्थ : जिसका अन्त नहीं है - ऐसी गाढ़ मोहरूपी निद्रा में यह लोक, चिरकाल से सोया हुआ है, लेकिन अब इस शास्त्र को जान कर, जाग्रतदशा को प्राप्त हो ।