
चित्स्वरूप-गगने जयत्यसौ, एकदेश-विषयाऽपि रम्यता ।
ईषदुद्गतवच: करै: परै:, पद्मनन्दि-वदनेन्दुना कृता ॥47॥
पद्मनन्दि मुख-चन्द्र-किरण-वचनों से किञ्चित् उदित अहो !
स्वसंवेदनगम्य रम्यता, चेतन नभ में जयवन्तो॥
अन्वयार्थ : पद्मनन्दि मुनि का जो मुख, वही हुआ चन्द्रमा, उससे कुछ उदय को प्राप्त, ऐसी जो वचनरूपी उत्कृष्ट किरण, उनसे उत्पन्न की गई और स्व-संवेदन प्रत्यक्ष के द्वारा गोचर ऐसी यह रम्यता, चैतन्यस्वरूप आकाश में चिरकाल तक जयवन्त प्रवर्तो ।