
त्यक्ताऽशेष-परिग्रह: शम-धनो, गुप्तित्रयाऽलंकृत:;
शुद्धात्मानमुपाश्रितो भवति यो, योगी निराशस्तत: ।
मोक्षो हस्त-गतोऽस्य निर्मल-मते,-रेतावतैव ध्रुवं;
प्रत्यूहं कुरुते स्वभावविषमो, मोहो न वैरी यदि ॥48॥
सकल परिग्रह तज उपशम-धन, तीन गुप्ति से शोभित हैं ।
शुद्धात्माश्रित योगी को, पर से नहिं आशा किञ्चित् है ।
कुटिल स्वभावी मोह-शत्रु यदि, शिवपद में नहिं विघ्न करे ।
तो वह निर्मल-मति योगी! निज करतल में ही मोक्ष धरे॥
अन्वयार्थ : जिसने बाह्य तथा अभ्यन्तर के भेद से समस्त परिग्रहों का नाश कर दिया है, जिसके शान्ति ही धन है, मनगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति - इन तीन प्रकार की गुप्तियों से जो शोभित है, जिसे शुद्धात्मा की प्राप्ति हो गई है और जो निराश है अर्थात् जिसकी किसी भी पदार्थ में अंशमात्र भी इच्छा नहीं रही है - ऐसा यह योगी है । इसलिए निर्मल है बुद्धि जिसकी - ऐसे उस योगी के, यदि स्वभाव से ही कुटिल मोहरूपी वैरी, उस मोक्ष की प्राप्ति में विघ्न न करे तो परिग्रह आदि के रहितपने आदि कारणों से ही मोक्ष निश्चय से हस्तगत हो जाए अर्थात् उसकी प्राप्ति बहुत शीघ्र हो जाए ।