
स जयति गुरुर्गरीयान्, यस्यामलवचनरश्मिभिर्झगिति ।
नश्यति तन्मोहतमो, यदविषयो दिनकरादीनाम् ॥4॥
रवि-शशि भेद सकें न जिसे वह, मोह-तिमिर हो शीघ्र विनष्ट ।
जिनकी वचन-किरण से वे, उत्तम गुरु जग में हैं जयवन्त॥
अन्वयार्थ : जिन गुरुओं के निर्मल वचनरूपी किरणों से, जिसको सूर्य-चन्द्र आदि भी नाश नहीं कर सकते - ऐसा प्रबल मोहरूपी अन्धकार, बात ही बात में नष्ट हो जाता है; ऐसे वे उत्तम गुरु, सदा इस लोक में जयवन्त हैं अर्थात् ऐसे गुरुओं को मैं नमस्कार करता हूँ ।