+ मोक्ष की दु:साध्यता -
आस्तां जरादिदु:खं, सुखमपि विषयोद्भवं सतां दु:खम् ।
तन्मन्यते सुखं यत् तन्मुक्तौ सा च दु:साध्या ॥5॥
जरा आदि तो दु:ख ही हैं, बुध विषयानन्द में दु:ख मानें ।
सुख यथार्थ मुक्ति में भासे, किन्तु मुक्ति ही दुर्लभ है॥
अन्वयार्थ : संसार में जीवों को जन्म, जरा, मरणादि दु:ख तो दु:खरूप ही भासित होते हैं, परन्तु विषयों से उत्पन्न हुए सुख को जो जीव सुख मानते हैं, वह भी सुख नहीं, अपितु दु:ख ही है; अत: वास्तविक सुख, मोक्ष में ही है, परन्तु वह मोक्ष, अत्यन्त दु:साध्य है ।