+ विषयादिक सुख की सुलभता और मोक्ष की दुर्लभता -
श्रुतपरिचितानुभूतं, सर्वं सर्वस्य जन्मने सुचिरम् ।
न तु मुक्तयेऽत्र सुलभा, शुद्धात्मज्योतिरुपलब्धि: ॥6॥
श्रुत परिचित अनुभूत सभी को, सबकी कथा सुलभ चिरकाल ।
किन्तु मुक्ति का कारण आतम-ज्योति हुई नहिं अब तक प्राप्त॥
अन्वयार्थ : जिनको चिर काल से सुना है, परिचय किया है तथा अनुभव किया है - ऐसे समस्त काम, क्रोध, भोग, विकथा आदि सर्व प्राणियों को जन्म से प्राप्त हैं अर्थात् उनकी प्राप्ति तो सबको सुलभ रीति से हो सकती है, किन्तु-मुक्ति प्राप्ति के लिए शुद्ध आत्मज्योति की प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है ।