
बोधोऽपि यत्र विरलो, वृत्तिर्वाचामगोचरो बाढम् ।
अनुभूतिस्तत्र पुन; दुर्लक्ष्यात्मनि परं गहनम् ॥7॥
आत्मज्ञान भी दुर्लभ ही है, वर्णन भी नहिं करे वचन ।
अनुभव तो अतिशय दुर्लभ है, आत्मज्योति अत्यन्त गहन॥
अन्वयार्थ : आत्मा का ज्ञान भी अत्यन्त दुर्लभ है और उसका वर्णन भी वाणी के अगोचर है ; अत: जब उसका वाणी से वर्णन ही नहीं कर सकते, तब उसका अनुभव तो अत्यन्त ही दुर्लक्ष्य है; इसलिए आत्म-ज्योति अत्यन्त गहन है ।