
व्यवहृतिरबोधजन,-बोधनाय कर्मक्षयाय शुद्धनय: ।
स्वार्थं मुमुक्षुरहमिति, वक्ष्ये तदाश्रितं किञ्चित् ॥8॥
नय-व्यवहार अबुध सम्बोधन को नय-शुद्ध कर्मक्षयकार ।
अत: शुद्धनय से कहता हूँ, हे मुमुक्षु! निज स्वार्थ विचार॥
अन्वयार्थ : जो जीव अज्ञानी हैं, उनको समझाने के लिए व्यवहारनय है और कर्मों के नाश हेतु शुद्धनय है, इसलिए मोक्ष की इच्छा करने वाला मैं, अपने लिए शुद्धनय का आश्रय कर कुछ कहता हूँ अर्थात् शुद्धनय का वर्णन करता हूँ ।