
व्यवहारोऽभूतार्थो, भूतार्थो देशितस्तु शुद्धनय: ।
शुद्धनयमाश्रिता ये, प्राप्नुवन्ति यतय: पदं परमम् ॥9॥
अभूतार्थ व्यवहार कहा है, कहा शुद्धनय है भूतार्थ ।
जो यति शुद्धनयाश्रय करते, उन्हें परमपद होता प्राप्त॥
अन्वयार्थ : व्यवहारनय तो असत्यार्थभूत और शुद्धनय सत्यार्थभूत कहा गया है; अत: जो मुनि, शुद्धनय के आश्रित हैं, वे मोक्षपद को प्राप्त होते हैं ।