
तत्त्वं वागतिवर्ति, व्यवहृतिमासाद्य जायते वाच्यम् ।
गुणपर्ययादिविवृते: प्रसरति तच्चापि शतशाखम् ॥10॥
तत्त्व अगोचर है वाणी से, किन्तु कथन करता व्यवहार ।
गुण-पर्याय भेद से उसका, शत शाखा में हो विस्तार॥
अन्वयार्थ : निश्चयनय से तो तत्त्व, वाणी से अगोचर है अर्थात् वचन से उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकते; किन्तु वही तत्त्व, व्यवहारनय की अपेक्षा से वाच्य है ; वह तत्त्व गुण-पर्याय आदि के विवरण से सैंकड़ों शाखास्वरूप में परिणत हो जाता है ।