+ व्यवहारनय भी उपादेय -
मुख्योपचारविवृतिं, व्यवहारोपायतो यत: सन्त: ।
ज्ञात्वा श्रयन्ति शुद्धं, तत्त्वमिति व्यवहृति: पूज्या ॥11॥
नय व्यवहार मार्ग से ही, बुध जानें मुख्य और उपचार ।
इससे शुद्धतत्त्व का आश्रय, अत: पूज्य कहते व्यवहार॥
अन्वयार्थ : मुख्य जो शुद्धनय, उसमें उपचार से जिसका विवरण है - ऐसे व्यवहारनय की सहायता से सज्जन पुरुष, शुद्ध तत्त्व का आलम्बन करते हैं, अत: व्यवहारनय भी पूज्य ही है ।